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दुनिया की कोई भी कला बंधन में नहीं निखर सकती।

सम्राट अकबर के दरबार में नौ नवरत्न हुआ करते थे। तानसेन सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक थे,तानसेन अपने समय के बहुत ही प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे। 

संगीत सम्राट तानसेन 



तानसेन और सम्राट अकबर के बीच बहुत ही मधुर संबंध थे। लेकिन राजा आखिर राजा ही होता है और सेवक हमेशा सेवक ही रहता है चाहे वह राजा का कितना ही करीबी क्यों ना हो। यह बात तानसेन अच्छी तरह से समझते थे और इसी बात का दर्द उन्हें हमेशा परेशान करता था। एक दिन बुरा न मानने की शर्त पर सम्राट अकबर ने तानसेन से कहा कि इस बात में कोई शक नहीं है कि तुम बहुत अच्छा गाते हो और बहुत ही सुरीली आवाज से सबका दिल जीत लेते हो लेकिन जो बात तुम्हारे  गुरु के गायन में है वह तुम्हारे गायन में नहीं । तुम्हारे गुरू स्वामी हरिदास की वाणीं में एक अलग ही आत्मिक आनंद और स्वर्गीय अनुभूति का अनुभव होता है। क्या तुम इसका कारण बता सकते हो? कंठ तो तुम्हारा भी उतना ही मधुर है। राग-रागनियों पर तुम्हारा भी सम्पूर्ण अधिकार है। स्वर-लय-ताल में कोई भंग नहीं है। बल्कि तुम्हारी प्रसिद्धी तो अपने गुरू स्वामी हरिदास जी से ज्यादा ही है। लेकिन ऐसी कौन सी वजह है कि तुम्हारे संगीत में कुछ न कुछ कमी रह ही जाती है। जो आत्मिक सुख और परमानन्द की अनुभूति स्वामी जी की मधुर वाणीं के द्वारा सुनाएं गए संगीत से होती है,वह तुम्हारे संगीत से नहीं होती।
तानसेन ने उत्तर दिया – जहांपनाह! यह भेद संगीत की विशेषज्ञता का नहीं बल्कि एक स्वतंत्र और एक गुलाम की गायिकी का है। अकबर ने कहा मतलब! तानसेन ने उत्तर दिया – जहांपनाह! मतलब यही है कि जब मेरे गुरुदेव गाते हैं तो अपनी इच्छा से, अपने मन की मौज में, ईश्वर भक्ति में मुक्त – गायन करते हैं जैसे पंछी खुले आकाश में पूरे आनंद  और उल्लास के साथ चहक रहे हो…खुले गगन में ऊंची उड़ान भर रहे हो। लेकिन जहांपनाह जब मैं गाता हूं तो आपके आदेश से गाता हूं, अपने मन की मौज से नहीं। जहांपनाह आप के आदेश से तानसेन के भीतर छिपा हुआ एक गुलाम गाता है जबकि मेरे गुरु को गायन के लिए किसी के आदेश की जरूरत नहीं होती। वे तो स्वयं अपने मन-मर्जी के मालिक है। जो संगीत स्वयं की नैसर्गिक प्रेरणा से नहीं निकलता उसमें वह आनंद आ ही नहीं सकता जो मेरे गुरुदेव के मुक्त, स्वतंत्र गायन से आता है। संगीत क्या दुनिया की कोई भी कला बंधन में नहीं निखर सकती। 
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